कहानी : अपनी माटी अपना गाँव

कहानी :

अपनी माटी अपना गाँव 

               डाॅ. उमेश कुमार शर्मा

          बस, साले भर में इतना कुछ बदल गया! कैली गाय फिर से गाभिन है। बाछे ने हल पकड़ लिया है! शैनी की माई ने खस्सी बेचकर पचकठवा कोली (खेत) छुड़ा लिया है! उसमें मकई की फसल ऐसी है कि पूछो मत। एक-एक गाछ में पाँच-पाँच बालियाँ! मनोहर मालिक ने पूरे एक बीघा खेत बटाई पर दे दिया है, जिसमें गेहूँ की फसल अब पकने वाली है।' जोगी को, शैनी की माई पर विश्वास नहीं हो रहा था। जनानी जात है। क्या मालूम....परदेश से वापिस आबे खातिर इतना कुछ बोल गयी हो......

             वह अब तक उकरू बैठा हुआ था। ट्रेन में पैर रखने की जगह नहीं थी। खड़े- खड़े उसकी टांगें टूट रही थीं। दायां पैर जैसे सुन्न हो गया था...... अभी रात के करीब एक बज रहे थे। उनकी आँख लगने लगीं। वह चप्पलों को घुसकाकर किसी तरह टाँग मोरने लायक जगह बनाया था, लेकिन चुत्तर रोपना अब भी मुश्किल था, क्योंकि पीछे एक मोटी अधेर महिला अपने झोले को पजियाए खर्राटे ले रही थी। उसके बाजू में खड़ा गुनेसर खैनी थूककर न जाने कब से संडास जाने को छटपटा रहा था। लेकिन सुबह से पहले वहाँ तक पहुँचना संभव न था। रास्ता बन जाने की उम्मीद में वह करीब घंटे भर से सबका मुँह ताक रहा था। उसका बायाँ हाथ तो पायदान को जोर से कसे था, किन्तु दायां हाथ रह-रहकर कमर के नीचे जाकर गुप्तागों को बकोट लेता था।

            गाड़ी को दरभंगा स्टेशन पहुँचने में अभी छह घंटे और लगेंगे.....

            एक बाबू से यह सुनकर गुनेसर की पीड़ा असह्य हो गयी.... वह मन- ही- मन जोगी को गरिया रहा था। इस फागुन मास में कोई घर आता है....? अभी तो पंजाब में कुछ ही दिनों में धनरोपनी शुरू होने वाली है। चार जने मिलकर एक एकड़ रोपते। सोलह सौ टाका चार-चार सौ हिस्सा। हमहूं सकला पगला गये थे, एकर बात सुनके गाड़ी घर लिए....! रतिया, जुगेसर, सोनमा, रमुआ सब माल पीट लेगा.......

           जोगी के दिमाग में लगमा वाली की सारी बातें नाच रही थीं। रघुआ रोज स्कूल जाने लगा है। स्कूल में नये-नये मास्टर जी बहाल होके आए हैं। खूब पढ़ाई होती है। सोमनी को स्कूल ड्रेस का पैसा मिला है। बाल-बच्चे की जिनगी बन जाए.... और क्या लेना है दुनिया में....! 

         वह ठीक कहती है। रघुआ पढ़-लिख के अच्छा काम करेगा। अब क्या रखा है मजदूरी में....! भोर से साँझ खटते रहो और सारा माल ठिकेदार.....नम्मरदार मार जाता है। जमींदार तो पर एकड़ पर चौबीस सौ रुपये देता है......मजदूरों को क्या मिलता है......? ऊपर से गाली बात...फजीहत....! 

           एक बीघा खेत.... इतना मेहनत करेंगे कि सोना उबजेगा......

           अरे! हमर खेत त' पूरे लहलहा रहा है! एक- एक गाछ में

एक-एक गाछ में पाँच-पाँच बालियाँ। अरे, हमारू खेल्ने पूरे लहलहा रहा है सरसों कैसन झूम रहा है शैनी की माई पाईप खींच खींच कर खेत पटा रही है। रघुआ आड़ चीर-चीर के पूरे खेत में पानी पहुँचा रहा है। सोमनी थरिया से पानी उपछ रही है। तभी लगमा वाली बोलती है- 'दौड़ रे रघुआ, आड टूट के पानी दोसर खेत में बह रहा है। जोगी की आँखें खुली जब गुनेसर ने उसे झमारकर कहा- 'सुतले रहेगा.. गाड़ी दरभंगा टीशन आ गयी।"


जोगी जल्दी-जल्दी अपनी बोरी सँभाल कर माथा पर लिया। गुनेसर भी बीडी सुलगाकर उसके पीछे चलने लगा। उसके मन में अब भी पंजाब का वह खेत घूम रहा था जो कुछ ही दिनों में धनरोपनी के लिए तैयार होने वाला था।


दोनों गाँव की सीमा में प्रवेश कर गये थे। अब आधे घंटे का रास्ता काटना था। जोगी की आँखें चमक रही थीं। सड़क के दोनों ओर खेतों में गरमा धान पछुत हवा के झोके में नृत्य कर रहा था। दूर-दूर तक खेतों हरियाली फैली थी। गेहूँ, मकई, मटर और सरसों के साथ आलू, प्याज, धनिया, मैथी, गोभी और मिर्च की फसलों से धरती की कोख भरी-भरी थी।

[02/11, 11:54 am] Dr. M K Majhi.: गेनुसर अपने घर की तरफ मुड़ चुका था। जोगी सड़क से उतर कर पगडंडियों से चला जा रहा था, जिसके दोनों तरफ से गेहूँ और सरसों की बालियों मानो झुक झुककर उसका पैर छूना चाह रही हों। वह अपने 'पचकठवा कोली (खेत) को देखते हुए जाना चाहता था। आज वह मानो धरती पर फैली हुई हरियाली को अपने भीतर समेट लेना चाह रहा हो। उसी हरियाली के बीच वह अपने पचकठवा को खोज रहा था, जो पिछले सात सालों से भरना (गिरवी) लगा था।


नहीं मिलती। जोगी अपनी खेत को शायद ही पहचाना पाता अगर उसे शैनी की माई साग तोड़ती हुई


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मकई का पौधा बालियों से लदा था। नीचे आलू की फसल लगी थी. साथ में मूली और,


धनिया। जागी का मन महक उठा। वह अपनी बोरी पटककर पॉजे भर मकई के पौधे को समेटकर से रो पड़ा शैनी की माई, कौन कहता है। हमारी धरती से सोना नहीं उब जाता है। ई तो हमर माई है. जो बाँझ नहीं हो सकती। हम अपन माई के छोड़ के, कहूँ नहीं जाएंगे, शैनी की माई।"


जोगी भावधारा में बहता ही जा रहा था कि उसकी नजर जवान बाछे पर पड़ी, जिसे लेकर रघुआ बराने आया था। उनकी आँखें चमक उठीं मन


अरे, ई बाँछा ते पूरे बैल हो गया। जोगी ने मनही मन महादेव का नमन किया। उनकी खुली बाहें और फैल गयीं, जिसमें वह एक साथ समेट लेना चाहता था-पच कठवा में पसरे मकई के पौधे को. जबान बाछे को, बकरियों के मेमने को रघुवा को और उसकी माँ को।

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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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