विभाजन की त्रासदी और हिन्दी उपन्यास
भारतवर्ष के इतिहास में राष्ट्र-विभाजन सबसे बड़ी त्रासदी है! इस त्रासदी ने मानवीय संवेदना को झकझोर कर रख दिया। मानव के भीतर विद्यमान दानवी-वृत्ति मुखर हो उठी। मानवता तार- तार हो गई। इतिहास की इस त्रासदी को उपन्यास में विस्तार से व्यक्त किया गया है। विभाजन की कथा, दुःख-दर्द, दंश, संघर्ष और राजनीति उपन्यास के कथ्य और शिल्प में अधिक सार्थकता से विन्यस्त हुआ है। हिन्दी के चर्चित आलोचक डाॅ. मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में, "विभाजन की त्रासदी की पूरी भयावहता, उसकी जटिलता और समग्रता को हिन्दी के अनेक उपन्यासकारों ने महत्त्वपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त किया है। मुझे लगता है कि यह कवियों और कथाकारों की मानसिकता से अधिक कवि और कथा-साहित्य के स्वभाव की भिन्नता से जुड़ी हुई सच्चाई है।"(1) विभाजन की त्रासदी और साम्प्रदायिकता पर लिखे गये उपन्यासों में राही मासूम रजा का 'आधा-गाँव', यशपाल का 'झूठा सच', भीष्म साहनी का 'तमस', बदीउज्जमा का 'छाको की वापसी', कुर्तुरुल एन हैदर का 'आग का दरिया', अब्दुल्ला हुसैन का 'उदास नस्लें', कमलेश्वर का 'कितने पाकिस्तान', दूधनाथ सिंह का 'आखिरी कलाम' और गीतांजलि श्री का 'हमारा शहर उस बरस' तथा तस्लीमा नसरीन का 'लज्जा' महत्त्वपूर्ण हैं। इन उपन्यासों में विभाजन मे से उपजी समस्या, साम्प्रदायिकता, जीवन संघर्ष और त्रासदी के साथ जीवन-सौन्दर्य एवं संभावनाओं की तलाश भी है। यह अलग बात है कि इनके कथ्य अलग-अलग हैं। कहीं कथा में महाकाव्यात्मक वितान है, तो कहीं आँचलिक भाषा का रंग और ढंग।
'आधा-गाँव' का कथानक 'गंगौली' गाँव के ऐसे मुस्लिम समुदाय की व्यथा-कथा है, जिन्हें न विभाजन से कुछ लेना-देना है और न विभाजन की राजनीति से। फिर भी वह उसके दंश को झेलते हैं। विभाजन की समस्या के साथ उपन्यास में मुस्लिम सामंत और दलित समुदाय के अन्तर्विरोध की भी कथा है। गंगौली गाँव के लोगों को अपनी भाषा से और लोकेल से प्रेम है। भारत व पाकिस्तान से अधिक। वह हिन्दी, उर्दू और भोजपुरी से मिलकर बनी भाषा का प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा और गाँव जवार को छोड़कर वह कहीं और नहीं जाना चाहते। इसीलिए पाकिस्तान या भारत से अधिक गंगौली को महत्त्व देते हुए गाँव का तन्नू जब यह कहता है, तो वह आधा गाँव का पूरा सच बन जाता है।"मैं मुसलमान हूँ, लेकिन मुझे इस गाँव से मोहब्बत है, क्योंकि मैं खुद यह गाँव हूँ। मैं नील के इस गोदाम, इस तालाब और इन कच्चे रास्तों से प्यार करता हूँ, क्योंकि ये मेरे ही मुख्तलिफ रूप हैं। मैदाने जंग में जब मौत बहुत करीब आ जाती थी तो मुझे अल्लाह याद आता था, लेकिन मक्का-ए-मुअज्ज कर्बलाए गुअल्ला की जगह मुझे 'गंगौली' याद आता था।"(2)
प्रगतिशील कथाकार यशपाल का 'झूठा सच' विभाजन की त्रासदी और उससे उपजी बिडम्बनाओं का महाख्यान है। 'वतन और देश', व 'देश का भविष्य' दो-खण्डों में विन्यस्त इस उपन्यास में विभाजन के सामाजिक-राजनीतिक कारकों, दंगों में घटित हैवानियत को शर्मसार करने वाली घटनाएं, स्वतन्त्रता के बाद के स्वप्न और आदर्शों का नष्ट होना, अनगिनत जनता का अनिश्चित भविष्य, विभाजन के त्रासदी की शिकार नारियाँ और बच्चे, आमजन का संघर्ष, सतही राजनीतिक दाँव-पेंच का जैसा चित्रण यशपाल ने किया है, वह इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों के चित्रण से कहीं अधिक तथ्यपरक, सूक्ष्म और सर्जनात्मक है। स्वतन्त्रता-पूर्व के परिवेश और स्वतन्त्रता के बाद की सजग पड़ताल यशपाल के साहित्य, समाज, राजनीति, इतिहास और मानवीय संवेगों की गहरी समझ का परिचायक है। विभाजन की त्रासदी में सबसे अधिक सतायी और जलायी गयी स्त्री। स्त्रियों पर ढाये गये जुल्म के चित्रण को उपन्यास में पढ़कर मन करुणा और क्रोध से भर जाता है। उपन्यास में एक स्त्री का यह कथन इसी बात की पुष्टि करता है, "हिन्दुनी हो चाहे मुसलमानी जो अपने इज्जत के लिए मर गयी, वही सबसे अच्छी रही। बहनों! औरतों के शरीर की तो बरबादी ही है। औरत तो ढोर-बकरी है, जो चाहे छीन ले जाए। दुश्मन की चीज समझकर काट डालो। जाने किन कर्मों के फल से औरत का तन पाया है।"(3)
भीष्म साहनी भारत-पाक विभाजन के द्रष्टा भी हैं और भोक्ता भी। उपन्यासकार 'तमस' के बहाने संक्षिप्त कलेवर में विभाजन के कारक तत्त्वों की जाँच-पड़ताल करता है। विभाजन के दौर में होने वाली भयानक अमानवीय घटनाएँ, जिनके प्रति लोग तैयार न थे, फिर भी उन्हें इसका भुक्तभोगी होना पड़ा। 'तमस' उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध और विभाजन से उपजी त्रासदी के इतिहास के सच को, अमानवीयता को, पागलपन और दरिंदगी को कथा में बड़ी सूक्ष्मता से विन्यस्त करता है। उपन्यास में हिन्दू-संगठन द्वारा दीक्षित एक किशोर इन्द्र द्वारा इत्रफरोश की हत्या का चित्र इतना मार्मिक और कारुणिक है कि उसमें विभाजन के आन्तरिक और बाह्य आशयों का उद्घाटन हो जाता है। इत्रफरोश की बच्चे द्वारा की गयी हत्या, जिसके लिए वह तनिक भी तैयार न था, हमले के बाद उसके मन में उठने वाले संवेगों को उपन्यासकार का यह कथन विभाजन की उस त्रासद भयावहता को प्रकट करता है, जिसके लिए आपस में प्रेम करने वाली आम हिन्दू-मुस्लिम जनता सजग न थी। कथन इस प्रकार है- "वह कमर में लगे जख्म से इतना नहीं मर रहा था, जितना त्रास और भय से और भोले बालक द्वारा किए गये हमले से।"
'झूठा सच' और 'तमस' की तरह विभाजन की त्रासदी उसके आन्तरिक और बाह्य आशयों में चित्रित करने वाले उपन्यासों में 'उदास-नस्लें', 'आग का दरिया' एवं 'छाको की वापसी' का नाम लिया जा सकता है। विभाजन पर केन्द्रित इन उपन्यासों में अलग-अलग कथारूपों के होते हुए भी कुछ बातें समान हैं। विभाजन से पूर्व भारत की साझी संस्कृति की स्मृतियों, रीति-रिवाजों को सहेज लेने की कचोट हर उपन्यास में मौजूद है। विभाजन के कारक तत्त्वों में उपनिवेशवाद, सामंतवाद और भारतीय राजनीति की स्वार्थी नीतियो के गठजोड़ की पड़ताल और पहचान हर उपन्यास करते हैं। इनके क्षुद्र और स्वार्थी नीतियो का परिणाम विभाजन की त्रासदी में हुआ, यही सबसे बड़ा सच है। विभाजन की त्रासदी का प्रतिफलन साम्प्रदायिक दंगों में हुआ। स्वतन्त्रता के बाद यह किसी-न-किसी रूप में भारतीय समाज में व्याप्त रहा। सदी के अन्तिम दशक में 'बाबरी मस्जिद विध्वंस' और नयी सदी का आरम्भ तो 'गुजरात दंगों' से ही हुआ। साम्प्रदायिकता का राजनीतीकरण इसका मुख्य कारक है। भारतीय राजनीति की टुच्ची नीतियों का परिणाम ये दंगे, फसाद और रंजिश है जो राजनेताओं एवं धर्म के ठेकेदारों की सोची-समझी रणनीति से घटित होती हैं। हाल ही में मुजफ्फरनगर के दंगे इसी के दहकते हुए साक्ष्य हैं।
हिन्दी में 'बाबरी मस्जिद विध्वंस' को केन्द्रित कर दूधनाथ सिंह का उपन्यास 'आखिरी कलाम' प्रकाशित हुआ। 80 के बाद आये भारतीय राजनीति के बदलावों और उसके खोखलेपन एवं उन्माद को यह उपन्यास सूक्ष्मता से अंकित करता है। 1992 के साम्प्रदायिक दंगों को ही आधार बनाकर लिखे गये उपन्यासों में गीतांजली श्री का उपन्यास 'हमारा शहर उस बरस' में साम्प्रदायिकता के व्याप्ति की समीक्षा करता है। अनपढ़ और आम ही नहीं पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी भी साम्प्रदायिकता के उन्माद में बह जाते हैं। साम्प्रदायिक से जुड़ी समस्याओं और बिडम्बनाओं पर नये शिल्प और भाषा के तेवर में लिखा गया उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' इसकी उत्तर-कथा है। भगवान सिंह का उपन्यास 'अपने-अपने राम', विभूति नारायण राय का उपन्यास 'शहर में कर्फ्यू' को याद करना आवश्यक है, जिसमें साम्प्रदायिकता के सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभावों का कथानक है।
विभाजन और साम्प्रदायिकता का प्रभाव कहीं सीधे पड़ा तो कहीं इसका असर परोक्ष रूप में जन-जीवन की दृष्टि और सोच पर पड़ा। इस आशंका और तनाव का सबसे सीधा असर मुस्लिम समाज पर पड़ा। इन विसंगतियों के साथ ही मुस्लिम समाज का संघर्ष, जातीय अन्तर्विरोध, द्वन्द्व और आशंकाओं को पूरी संश्लिष्टता के साथ कई उपन्यासों ने रचा है, जिनमें मंजूर एहतेशाम का 'सूखा बरगद' शानी का 'काला-जल' और अब्दुल बिस्मिल्लाह का 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' में स्वतन्त्र भारत के मुस्लिम समाज की व्यथा-कथा है। शानी का 'कालाजल' (1965 ई.) बस्तर के निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार की कहानी है। उपन्यास में विन्यस्त कथा सम्पूर्ण भारतीय मुसलमान के जीवन की विसंगति, बिडम्बना और जड़ता के प्रतीक 'कालाजल' के रूप में हुई है। सड़ांध में जीने को अभिशप्त ये परिवार अपने ही लोगों द्वारा बहकावे में आकर, विसंगति का शिकार होकर जीवंत पात्र भी कैसे जड़ हो जाता है, शानी ने इस उपन्यास में व्यापकता से अंकित किया है। मंजूर एहतेशाम का उपन्यास 'सूखा बरगद' (1986) भारतीय मुसलमानों के जीवन की जटिलताओं, आशंका और मानसिक द्वन्द्व को व्यापक संदर्भों में चित्रित करता है। साम्प्रदायिकता की समीक्षा यह उपन्यास मुस्लिम समाज और जीवन संघर्षों के आन्तरिक आशयों और बुनावट में करता है। मुस्लिम समाज की कथा के बहाने उपन्यास में भारतीय राष्ट्र की पुनर्व्याख्या भी है। अब्दुल बिस्मिल्लाह उपन्यास 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' (1986) में गरीब मुस्लिम बुनकरों की शोषित और त्रासद जिंदगी का यथार्थ चित्रण करते हैं। साम्प्रदायिकता की भयावहता से अधिक इस उपन्यास में शोषण की कथा है जो बुनकर समाज के धनी अपने ही समुदाय के गरीब बुनकरों का शोषण करते हैं। जीवन भर दूसरों की बीवी के लिए साड़ी बुनने वाला बुनकर एक अच्छी साड़ी अपने बीवी को नहीं पहना पाता। यों कि इन उपन्यासों में विभाजन, साम्प्रदायिकता, मुस्लिम समाज के अन्तर्विरोधों का चित्रण तो है ही, खास है उपन्यासकारों की जनपक्षघर शोषण विरोधी मानवतावादी दृष्टि ।
समग्र रूप से विचार करें तो राष्ट्र-विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे स्याह अध्याय है। हिन्दी उपन्यासों में इसकी अभिव्यक्ति केवल एक 'रिपोर्ट' के रूप में नहीं हुई है, बल्कि इसे मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत किया गया है। ये उपन्यास अपने समय का साहित्य भी है और सामाजिक- राजनीतिक इतिहास भी।
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