वर्तमान समय में स्त्री अस्मिता के सवाल
- डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
इस वैचारिक आलेख का आरंभ हम एक प्रचलित मिथकीय कथा से करना चाहेंगे, जिसमें 'चने की पीड़ा' अभिव्यक्त हुई है! हुआ यह कि चना पृथ्वीलोक से बेहद त्रस्त होकर ब्रह्मलोक पहुँचा और ब्रह्मा जी के सामने रोकर कहा कि 'हे प्रभु! मुझे पृथ्वीलोक पर बहुत कष्ट हो रहा है! अब मैं वहाँ नहीं रह सकता! ब्रह्मा जी को उसने बताया कि पृथ्वीलोक पर कोई उसे आग में भून कर खाता है, कोई दाल बनाकर, कोई गर्म बालू में भूनकर, कोई उसे बेरहमी से चक्की में पीसकर सत्तू बनाकर पीता है! चने को सबसे अधिक शिकायत थी, उन लोगों से जो उसे पूरी रात पानी में भींगने के लिए छोड़ देते हैं और सुबह में उसे कच्चा चबाते हैं।
चने की बात सुनकर ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले कि इसका मतलब है कि तुम बहुत स्वादिष्ट हो, तभी तो लोग तुम्हारे पीछे पड़े रहते हैं। गलती मेरी ही है। मैंने पृथ्वीलोक पर भेजने से पहले तुम्हारा स्वाद चखा नहीं। चलो अभी चख लें......। ब्रह्मा जी चने को पकड़कर मुँह में डाल ही रहे थे कि चना वहाँ से किसी तरह छिटककर पृथ्वी पर आ गिरा! इस कारण चने की नाक टेढ़ी हो गई। हमारे समाज में स्त्री की स्थिति बहुत कुछ चने जैसी है। वह जहाँ भी अपनी रक्षा की गुहार लगाने पहुँचती हैं, वहीं लोगों की जीभ लपलपाने लगती है। घर से बाहर तक, अपने से पराये तक, सब उसका स्वाद चखना चाहता है! उऐसी सामाजिक स्थिति में स्त्री-अस्मिता की तलाश कितना कठिन हो सकता है, इसे सहज ही समझा जा सकता है।
आज विमर्शों का दौर चल रहा है, जिसमें खासकर हाशिए के लोग अपनी अस्मिता की तलाश कर रहे हैं। समाज में अपनी पहचान की खोज कर रहे हैं, अपने महत्व के प्रश्न को उठा रहे हैं। दलित, आदिवासी, किन्नर और स्त्री की अस्मिता के सवाल अधिक महत्त्वपूर्ण हो रहे हैं। ये सभी मनुष्य होने के नाते सामाजिक ,राजनीतिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्तर पर लगातार बराबरी की मांग कर रहे हैं। यह मांग मानवोचित है।
मौजूदा समय में स्त्री-विमर्शकारों ने जो स्त्री-अस्मिता के सवाल उठाए हैं या उठा रहे हैं, वे सवाल एकांगी और अधूरे हैं। कारण यह रहा कि आरंभ में बहुत दिनों तक ये सवाल सहानुभूतिपूर्वक पुरुषों ने उठाए, जिनकी संवेदना में कोई न कोई सुराख अवश्य रहा। जितनी प्रखरता के साथ इसे उठाने की आवश्यकता थी, उतनी प्रखरता से नहीं उठाई जा सकी। दूसरा कारण यह कि साहित्यिक तौर पर 'स्त्री-विमर्श' के नाम पर मुट्ठी भर स्त्रियों का विमर्श होता रहा है, जो या तो शहरी स्त्रियाँ हैं, या शिक्षित स्त्रियाँ। स्त्रियों का एक विशाल समूह जो ग्रामीण स्त्री का है, मुस्लिम तथा दलित स्त्रियों का है। उनके सवाल अब तक या तो नहीं उठाए गये, या बहुत कम उठाए गए।
वास्तव में स्त्री -विमर्श अपने मुद्दे से भटक गया है। स्त्री-स्वातंत्र्य के नाम पर उन्मुक्त यौनाचार की मांग की जा रही है। जबकि स्त्री को उसके जन्म से लेकर जीवन के अंत तक अभिशप्त रहना पड़ता है। जिस पुरुष पर अटल विश्वास कर वह अपने माता-पिता, अपने परिजन, अपने समाज को छोड़कर जाती है, वह पुरुष उसकी जीवनपर्यंत अग्निपरीक्षा लेता रहता है। पुरुष स्वयं चाहे कितना ही लंपट क्यों न हो, उसे एक सती सावित्री टाईप पत्नी चाहिए....!
वर्तमान संदर्भ में स्त्री -विमर्श भटकाव की स्थिति में है।उन्मुक्त यौनाचार को ही असली आजादी का पर्याय समझा जा रहा है। स्त्री को उसके बहुआयामी अधिकारों के प्रति सजग करने के बजाय उसे खाल, बाल और गाल को चमकाने में उलझा दिया गया है। स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या रही है कि वह अपने हिस्से की लड़ाई पुरुष के भरोसे छोड़ रखी है, जबकि वह अपनी लड़ाई स्वयं लड़ सकती है।
वास्तव में, स्त्री-विमर्श बाल, गाल और खाल को चमकाने का विमर्श नहीं है। बल्कि समाज की जिस उपभोक्तावादी दृष्टि के कारण स्त्रियाँ अभिशप्त होती रही हैं, उसके खिलाफ एक सुनिश्चित और अनवरत जंग है स्त्री- विमर्श।दुखद यह है कि अब तक जिसके लिए वह पुरुष को जिम्मेदार ठहराती रही है, उस मकड़जाल में आज वह स्वयं फँसने के लिए लालायित हो रही हैं। तंग वस्त्र प्रयोग से लेकर अंग प्रदर्शन तक में वह स्वेच्छापूर्वक आगे आ रही है। और दुखद है कि इसे ही वह वास्तविक आजादी मान बैठी है। कुल मिलाकर कहें तो स्त्री-मुक्ति के सवाल मुद्दे से कुछ हद तक भटक गया है।
भारत में पुरुषसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था रही है, जिसके कारण सामाजिक, राजनीतिक ही नहीं सृजनात्मक स्तर पर पुरुषों का अधिपत्य रहा है। पुरुषों के हाथ में शक्ति थी, इसीलिए उसने ऐसी व्यवस्था बनाई जो सदैव पुरुषों के हित में हो। ऐसी स्थिति में स्त्री दोयम दर्जे की नागरिक बनी रही। स्त्री के व्यक्तित्व के विकास के लगभग सारे मार्ग धीरे-धीरे बंद कर दिये गये। सृजनात्मक तौर पर जो भारत की साहित्यिक परंपरा है, वह पुरुषवादी व्यवस्था का संपोषक रहा है। रामायण में सीता- निर्वासन की कथा हो, शूर्पणखा के नाक काटने का प्रसंग हो या अहिल्या के शीलहरण और श्रापित होने की कथा...ये सभी स्त्री-शोषण का पौराणिक वृत्तांत हैं। महाभारत में द्रौपदी के अपमान की कथा बेहद शर्मनाक है। उसे कौरवों की सभा में तो बाद में अपमानित किया गया। पहले तो उनका घोर अपमान पांडवों ने किया था। द्रौपदी को अर्जुन ने जीता था, उन पर उसी का एकाधिकार होना चाहिए, पर कुंती के समक्ष उसे शिकार के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके कारण माँ ने आदेश दिया कि पाँचों भाई बांटकर खाओ। बांट लिया पाँचों भाईयों ने एक निरीह स्त्री की अस्मिता को! पुराणों में सरस्वती के शील-हरण की शर्मनाक कथा है, जिसमें सद्य: स्नाता सरस्वती के प्रति पिता ब्रह्मा की यौनासक्ति की प्रस्तुति हुई है। जब ब्रह्मा ने सरस्वती से संसर्ग की इच्छा से उसका पीछा करना आरंभ किया तो वह क्रमश: सभी देवताओं से रक्षा की भीख मांगी थी, परंतु किसी ने उसकी रक्षा नहीं की। हारकर पिता-पुत्री में एक सौ सालों तक पति-पत्नी के रूप में रहने का एग्रीमेंट हुआ और दोनों हिमाचल की कंदराओं में सौ साल विहार करते रहे। आखिरकार यह कैसी संस्कृति है, जिसपर हम गौरवान्वित हो रहे हैं। यह तो लुटेरों, ऐय्याशों और बलात्कारियों की संस्कृति है। ऐसी सांस्कृतिक परंपरा से स्त्री-मुक्ति की उम्मीद करना बेमतलब की बात है। आज जरूरत है कि स्त्रियाँ स्वयं अपनी लड़ाई लड़े। स्वयं अपना साहित्य लिखे, स्वयं अपना इतिहास लिखे, स्वयं अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए।
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लेखक श्री राधाकृष्ण गोयनका महाविद्यालय, सीतामढ़ी (बिहार) के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक और अध्यक्ष हैं।
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