भारत की सांस्कृतिक क्रांति और बुद्ध
- डाॅ. उमेश कुमार शर्मा
भारत में चार बड़ी सांस्कृतिक क्रांतियाँ हुईं, जिनसे भारतीय समाज और संस्कृति का निर्माण हुआ। पहली क्रांति आर्यों और अनार्यों के बीच हुई, जो कालांतर में समन्वित होकर हमारी संस्कृति को समृद्ध किया। टदूसरी क्रांति सनातन धर्म की जड़वादी मानसिकता के विरुद्ध वर्धमान महावीर तथा बुद्ध ने की। तीसरी क्रांति हिन्दू -मुस्लिम के मध्य हुई तथा चौथी क्रांति तब हुई, जब पश्चिम के देशों ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया। इन चारों क्रांतियों से ही भारतीय संस्कृति ने अपना स्वरूप ग्रहण किया है। दरअसल, भारतीय समाज और धर्म संरचनात्मक विकृतियों के खिलाफ सबसे प्रखर क्रांति महात्मा बुद्ध ने किया। बुद्ध वास्तव में तद्युगीन परिस्थितियों की उपज थे। बुद्ध का अवतरण उस समय हुआ, जब भारतीय धर्म में हिंसावाद का बोलबाला था। यज्ञ तथा आडंबरयुक्त पूजा पद्धतियों के कारण समाज में पुरोहितों का बोलबाला था। साथ ही ब्राह्मणों की शुचितावादी नीति ने घोर जातीय विषमता को पैदा कर दिया था। त्रस्त जनता ऐसे धर्म की खोज में लगे थे, जो इन विकृतियों से उनकी रक्षा कर सके। ऐसा धर्म, जहाँ कर्मकांड नहीं हो, जहाँ जातीय विषमता नहीं हो, जहाँ वर्णाश्रमी व्यवस्था न हो, जहाँ मानव को केवल मानव के चश्मे से देखा जाय। ऐसी ही विपरीत परिस्थिति में बौद्ध धर्म का प्रवर्तन हुआ। महात्मा बुद्ध ने सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य को धर्म के मूल में स्थापित किया। उन्होंने 'मज्झिम निकाय' अर्थात् मध्यम मार्ग दिखलाकर भारतीय समाज को भटकाव से मुक्ति दिलाई। इसीलिए बौद्ध धर्म का हिन्दू धर्म के साथ गहरा अंतर्संबंध है। बौद्ध धर्म की लगभग सारी शिक्षाएँ हिन्दुत्व का ही परिष्करण है।
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