प्रस्तावना :
अनादिकाल से ही पुरुषवादी सामाजिक व्यवस्था में स्त्री को दोयम दर्जा प्राप्त है। यूँ तो प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को समान बनाया, परंतु पुरुषों ने कभी परंपरा के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर स्त्री को मुख्य धारा से धकेलकर बहिष्कृत कर दिया। इस संदर्भ में प्रसिद्ध स्त्रीवादी लेखिका सिमोन द बोअवार कहती है कि 'स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।' वास्तव में हमारे समाज के पास एक फर्मा है, जिसमें बचपन से ठोक -पीट कर स्त्री में स्त्रीपन भरने की अनवरत चेष्टा की जाती है। उसमें आरंभ से ही दासत्व का भाव भरा जाता है। उसे बताया जाता है कि स्त्री को तीन पुरुषों के संरक्षण में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र की सेवा ही उसका मूल धर्म है। ऐसी स्थिति में परिवार के तमाम चीजों पर मालिकाना हक पुरुषों का हो जाता है। जीवनपर्यंत दिन -रात खटने वाली स्त्री कभी सोच भी नहीं पाती कि आखिरकार वह क्यों और किसलिए इतना खट रही है? सारी संपति कभी पिता का होता है, कभी पति का तो कभी पुत्र का। स्त्री का जीवनपर्यंत आर्थिक परनिर्भरता का दंश भोगती रह जाती है। सुबह से रात तक काम करने के बावजूद चंद पैसों के लिए उसे हाथ फैलाना पड़ता है। रोमिला थापर ठीक ही कहती है कि 'जिस दिन स्त्री के श्रम का हिसाब किया जाएगा, उस दिन इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ी जाएगी।' आज, जबकि अर्थयुग है, स्त्री के श्रम का हिसाब होना ही चाहिए। उसे पुरुषों की भाँति संपत्ति का मालकाना हक मिलना ही चाहिए। स्त्री तब तक अपनी स्वाधीनता की लड़ाई में विफल रहेगी, जब तक वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न हो सकेगी। अतएव, आज स्त्री - धन के सवाल बेहद गंभीर हो रहे हैं।
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