तुमने कहा, मुझ पर लिखो कविता,
मैंने कोशिश की, लेकिन मैं कैसे कहूँ कि
तुम पर नहीं बन पाती हैं कविताएँ
तुम्हारे प्रेम और समर्पण को नहीं समेट पाता हूँ शब्दों में
शब्दों की रंध से चूने लगती हो तुम,
तुम्हारा सौन्दर्य, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण....!
तुम्हारी भावनाओं को समटने में बौने पड़ जाते हैं शब्द
प्रियतम! तुम परे हो, शब्दों की सीमा से.....
हार कर यहीं लिख देता हूँ-
अद्वितीय हो तुम...तुम्हारा प्रेम और तुम्हारा समर्पण!
डाॅ.उमेश कुमार शर्मा
0 Comments:
Post a Comment