धन, धान्य, ज्ञान, साहित्य और संस्कृति की पावन भूमि मिथिला बिहार की सांस्कृतिक राजधानी है। मिथिला का अपना गौरवशाली अतीत है। उत्तर में नेपाल, दक्षिण में गंगा, पूरब में पूर्णियाँ और पश्चिम में मुजफ्फरपुर इसकी सीमा है। मिथिला की धरती वीरों और विद्वानों की धरती है।
जब-जब राष्ट्र पर संकट आया है, मिथिला ने उसमें अपनी शानदार भूमिका निभायी है। राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम में इसका साहित्यिक अवदान चिरस्मरणीय है। इसकी परंपरा मूलत: विद्यापति से शुरु होती है। विद्यापति ने अपनी रचना 'कीर्तिलता' में कीर्ति सिंह के बहाने मिथिला पर इस्लामिक शासक अशलान के विरुद्ध जिस संघर्ष का उल्लेख किया है, उसका अपना ऐतिहासिक महत्व है। कीर्ति सिंह ने उस वक्त मिथिला की आन,बान और शान की रक्षा के लिए भयानक युद्ध किया था।
स्वाधीनता-संग्राम के दौरान मिथिला के हिन्दी साहित्यकार निरापद नहीं थे। उन्होंने अपनी रचनाओं से भारत की सोयी हुई जनता में स्वाधीनता के प्रति नवचेतना का संचार किया है। ऐसे साहित्यकारों में रामधारी सिंह दिनकर का नाम सर्वोपरि है। दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा तथा रश्मिरथी के माध्यम से स्वाधीनता-संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दिनकर के बाद नागार्जुन का नाम लिया जा सकता है, जिसने न केवल भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों को अपनी रचनाओं में उद्घाटित किया है, बल्कि देश के नागरिकों को उसकी स्वतंत्रता के प्रति भी सजग किया है। नागार्जुन ने व्यंग्यात्मक शैली में तदयुगीन भारतीय राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है।
अतएव, कहा जा सकता है कि स्वाधीनता-संग्राम में मिथिला के हिन्दी लेखकों की साहित्यिक भूमिका सराहनीय है।वर्तमान समय में भी मिथिला के लेखक स्वाधीनता को अक्षुण्ण बनाए रखने हेतु कटिबद्ध है।
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