हिन्दी हैं हम!

प्यारे मित्रो और विद्यार्थियों!

          हिन्दी की तमाम परीक्षाएँ- स्कूल शिक्षक से लेकर भाषा अधिकारी, प्रवक्ता पद एवं प्राध्यापक पद तक में उत्तर प्रदेश वाले ही बाजी मार जाते हैं! क्यों? क्योंकि वहाँ के छात्र-छात्राएँ हिन्दी को विज्ञान की तरह पढ़ते हैं। हिन्दी की तरह नहीं! वे उसी तरह हिन्दी की तैयारी करते हैं, जैसे कोई 'सिविल सेवा परीक्षा' की तैयारी करते हैं। और हम बिहारियों के लिए हिन्दी "बैठे ठाले का धंधा" है। कोई और विकल्प नहीं था तो हिन्दी ही ले लिएए! अक्सर ऐसा कहते हुए लोग आपको मिल जाएंगे। यही कारण है कि पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के बाद भी एक ढंग का आवेदन लिखने में अधिकतम लोग अक्षम सिद्ध होते हैं। तथा चपरासी पद के लिए भी ये मैराथन दौड़ में शामिल हो जाते हैं।भारत एक विचित्र देश है यहाँ शिक्षक बनने के लिए वही लोग सबसे आगे खड़े रहते हैं, जो कुछ और नहीं हो सकते!जो अपने जीवन के सभी दाव हार गये होते हैं!

           मित्रो! हमलोग हिन्दी पढ़कर सदैव बेरोजगारी का रोना रोते हैं, जबकि हिन्दी पढ़कर रोजी-रोजगार के अनेक रास्ते खुलते हैं। देश से लेकर विदेश तक में हिन्दी विषय में रोजगार का फैलाव है। हिन्दी हमें काम, पैसा और प्रतिष्ठा सब कुछ दे सकती है। लेकिन तब जब हम तन मन धन से इसके प्रति स्वयं समर्पित कर दें।

          हम समझते हैं कि मानविकी संकाय में कोई भी विषय हिन्दी जैसा सरस  व्यापक और रोजगारोन्मुख नहीं है।रोजी-रोजगार के स्तर पर तो यह सबसे आगे है ही, ज्ञान के स्तर पर भी हिन्दी व्यापक है। इस विषय का संबंध ज्ञान के अनेक विषयों के साथ है। यथा- इतिहास, सामाजिक विज्ञान, राजनीति शास्त्र, दर्शन, धर्मशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र आदि। सवाल यह है कि क्या हम इतने स्तरों पर हिन्दी को समझने की कोशिश करते हैं या नहीं। 

            बहरहाल, अगर ठीक से हिन्दी विषय को पढ़ा जाए तो सहज ही इन तमाम विषयों का ज्ञान हो जाता है। काव्यशास्त्र, भाषा तथा समीक्षा के क्षेत्र में हिन्दी दुनिया के विकसित देशों के समानांतर चल रही है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस ज्ञान का ईजाद होता है, हिन्दी भाषा में वह शीघ्र अनुदित होकर आ जाता है। हिन्दी भाषा और साहित्य में शोध का स्तर भी वैश्विक है।   

          कुल मिलाकर कहें तो हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को हीनताबोध से मुक्त होना होगा। हम आखिरकार कब तक अपनी कमजोरी को हिन्दी की कमजोरी समझते रहेंगे। अभी वक्त हैं कि हम हिन्दी को अपनी समृद्धि का आधार बनाकर अपने भविष्य को सँवारें! 

                          जय- हिन्द!जय हिन्दी!! 


डाॅ.उमेश कुमार शर्मा

युवा रचनाकार और ब्लाॅगर 

संपर्क  : 6201464897

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Milan Tomic

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