मैं गीत रचता हूँ तुम्हारे प्यार में प्रिय,
लेकिन मेरे शब्द नहीं पहुँच सके हैं
तुम्हारे प्यार की अतल गहराई तक।
मैंने रचना चाहा लय तुम्हारे प्रेम का
शब्द तब भी हो गये हैं निष्काम हमारे
मैंने खोजा बहुत तुम्हारे सौन्दर्य का
दृष्टांत, पर मिला कुछ नहीं तुम -सा।
तुम्हारे रूप का नहीं मिला कोई उपमान
न सूरज, न चाँद, न सितारे, न कमल।
और तुम्हारे प्यार की गहराई नापने में
सरिता ही नहीं, सिन्धु भी काम न आए।
और अंत में दिल ने कहा कि तुम- सा
बस, तूँ ही मेरे प्रिय, तूँ ही है जीवन ज्योति
तुम्हारी रश्मियों से जीवन धन्य है मेरा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
लेकिन मेरे शब्द नहीं पहुँच सके हैं
तुम्हारे प्यार की अतल गहराई तक।
मैंने रचना चाहा लय तुम्हारे प्रेम का
शब्द तब भी हो गये हैं निष्काम हमारे
मैंने खोजा बहुत तुम्हारे सौन्दर्य का
दृष्टांत, पर मिला कुछ नहीं तुम -सा।
तुम्हारे रूप का नहीं मिला कोई उपमान
न सूरज, न चाँद, न सितारे, न कमल।
और तुम्हारे प्यार की गहराई नापने में
सरिता ही नहीं, सिन्धु भी काम न आए।
और अंत में दिल ने कहा कि तुम- सा
बस, तूँ ही मेरे प्रिय, तूँ ही है जीवन ज्योति
तुम्हारी रश्मियों से जीवन धन्य है मेरा।
उमेश कुमार शर्मा
युवा रचनाकार
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